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यह किताब—‘देहली की आख़िरी शम्अ’—मिर्ज़ा फ़रहतुल्लाह बेग देहलवी [1883-1947] की उन चुनिंदा रचनाओं में शामिल है जिसे उर्दू में बेहद लोकप्रियता प्राप्त हुई। इस रचना को कई बार स्टेज किया जाता रहा है। एक लंबे अंतराल के बाद हिंदी में इस किताब का प्रकाशन अब संभव हुआ है। यह किताब 1845 और उसके आसपास की देहली की साहित्यिक-सामाजिक-संस्कृतिक फ़ज़ा को दिलचस्प ढग से इस किताब में बयान करती है। उस समय के रहन-सहन, ज़बानो-बयान, तौर-तरीक़े आदि का वर्णन मिर्ज़ा फ़रहतुल्लाह बेग ने बख़ूबी इस किताब में किया है।
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